धान की फसल में करीब 50 दिन का समय बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इस दौरान फसल की बढ़वार, कल्ले और आगे बनने वाली बालियों के लिए पोषण की जरूरत बदलने लगती है। लेकिन 50 दिन बाद कोई एक ऐसी जादुई खाद नहीं है जो हर खेत में डालते ही रिकॉर्ड पैदावार की गारंटी दे। सही खाद और सही मात्रा का फैसला फसल की उम्र, किस्म, मिट्टी और पहले दी गई खाद के आधार पर करना जरूरी है।
50 दिन बाद धान में खाद देने का क्या मतलब है
रोपाई वाले धान में नाइट्रोजन को एक साथ देने के बजाय अलग-अलग चरणों में देने की सलाह दी जाती है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की खरीफ कृषि सलाह में कई परिस्थितियों के लिए नाइट्रोजन की अंतिम किस्त लगभग 50 से 60 दिन बाद देने की बात कही गई है। इसका उद्देश्य फसल को जरूरत के समय नाइट्रोजन उपलब्ध कराना है, न कि केवल अधिक मात्रा में खाद डालना।
इसी वजह से 50 दिन के आसपास खेत देखकर यह समझना जरूरी है कि फसल वास्तव में किस अवस्था में है। अगर पौधे स्वस्थ हैं, पत्तियों का रंग पर्याप्त हरा है और फसल पहले ही ज्यादा नाइट्रोजन ले चुकी है, तो बिना जरूरत अतिरिक्त यूरिया डालना सही तरीका नहीं माना जा सकता।
50 दिन पर सबसे ज्यादा ध्यान नाइट्रोजन पर क्यों
धान की बढ़वार में नाइट्रोजन की अहम भूमिका होती है। इसकी कमी होने पर पौधे कमजोर और पत्तियां अपेक्षाकृत हल्की हरी दिखाई दे सकती हैं। वहीं जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन देने पर केवल पत्तियों और तनों की अनावश्यक बढ़वार हो सकती है और फसल प्रबंधन की दूसरी समस्याएं भी बढ़ सकती हैं।
धान में नाइट्रोजन की जरूरत को पत्ती के रंग से भी समझा जा सकता है। लीफ कलर चार्ट यानी एलसीसी के माध्यम से पत्तियों के रंग का आकलन करके जरूरत के अनुसार नाइट्रोजन देने की तकनीक बताई गई है। इसमें ऊपर से पूरी तरह खुली तीसरी पत्ती के रंग को चार्ट से मिलाकर खाद की जरूरत का निर्णय किया जाता है।
इसलिए 50 दिन बाद खाद डालने का सही सिद्धांत यह है कि खेत की वास्तविक स्थिति देखकर नाइट्रोजन की जरूरत तय की जाए। केवल कैलेंडर में 50 दिन पूरे हो जाने से हर खेत में एक जैसी मात्रा डालना उचित नहीं है।
कौन सी खाद और कितनी मात्रा डालें
किसान अक्सर 50 दिन बाद यूरिया को ही मुख्य खाद मान लेते हैं, लेकिन धान में खाद प्रबंधन केवल यूरिया तक सीमित नहीं है। नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश की जरूरत फसल और मिट्टी के अनुसार अलग होती है। फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा कई अनुशंसाओं में शुरुआती अवस्था में देने की सलाह रहती है, जबकि नाइट्रोजन को कई किस्तों में बांटा जाता है।
इसलिए 50 दिन के आसपास खेत में यह देखकर आगे बढ़ना चाहिए कि पहले कितनी नाइट्रोजन दी जा चुकी है और फसल किस अवस्था में पहुंच चुकी है।
- अगर खेत में नाइट्रोजन की कमी के स्पष्ट संकेत हैं, तो अनुशंसित अंतिम किस्त पर विचार किया जा सकता है।
- अगर पत्तियां बहुत गहरी हरी हैं और फसल जरूरत से ज्यादा नरम या घनी बढ़ रही है, तो बिना जांच अतिरिक्त नाइट्रोजन नहीं डालनी चाहिए।
- मिट्टी की जांच उपलब्ध हो तो खाद की मात्रा तय करने में उसे प्राथमिकता देनी चाहिए।
- एक ही मात्रा को हर किस्म और हर खेत के लिए सार्वभौमिक नियम मानना सही नहीं है।
कई कृषि अनुशंसाओं में रोपाई वाले धान के लिए नाइट्रोजन को रोपाई के समय, लगभग 30 से 35 दिन और फिर लगभग 50 से 60 दिन पर बांटकर देने का तरीका बताया गया है। हालांकि वास्तविक मात्रा क्षेत्र, किस्म और मिट्टी के अनुसार बदल सकती है।
खाद डालते समय खेत की हालत भी जरूरी है
सिर्फ खाद की मात्रा सही होना पर्याप्त नहीं है। खाद देने के समय खेत में नमी की स्थिति भी महत्वपूर्ण रहती है। बहुत अधिक पानी खड़ा होने की स्थिति में खाद प्रबंधन प्रभावी तरीके से करना कठिन हो सकता है, जबकि अत्यधिक सूखी मिट्टी में भी पोषक तत्वों का उपयोग प्रभावित हो सकता है।
इसी तरह अगर खेत में खरपतवार बहुत ज्यादा हैं तो डाली गई नाइट्रोजन का एक हिस्सा खरपतवार भी इस्तेमाल कर सकते हैं। इसलिए खाद प्रबंधन को खरपतवार नियंत्रण, सिंचाई और फसल की अवस्था के साथ जोड़कर देखना चाहिए।
धान की पोषण व्यवस्था में एलसीसी जैसी तकनीक का इस्तेमाल इसी कारण उपयोगी हो सकता है। इसमें फसल की पत्तियों का रंग नियमित अंतराल पर देखा जाता है और आवश्यकता होने पर ही नाइट्रोजन की अगली मात्रा दी जाती है।
50 दिन के बाद बालियों की तैयारी पर दें नजर
धान की अलग-अलग किस्मों में बढ़वार और बालियां बनने का समय अलग हो सकता है। कुछ किस्मों में सक्रिय कल्ले निकलने की अवस्था पहले आती है, जबकि लंबी अवधि वाली किस्मों में यह समय आगे खिसक सकता है। इसलिए केवल दिन गिनने के बजाय फसल की वास्तविक अवस्था को देखना ज्यादा उपयोगी है।
धान में सक्रिय कल्ले निकलने और बालियां बनने से पहले की अवस्था पोषण प्रबंधन के लिहाज से महत्वपूर्ण होती है। कृषि तकनीकी अनुशंसाओं में नाइट्रोजन को फसल की अलग-अलग अवस्थाओं के अनुसार बांटने और जरूरत के मुताबिक देने पर जोर दिया गया है।
अगर 50 दिन के आसपास फसल स्वस्थ है और पौधे पर्याप्त कल्ले बना चुके हैं, तो किसान को केवल अधिक खाद डालने के बजाय आगे की फसल अवस्था पर ध्यान देना चाहिए। लक्ष्य पौधे को जरूरत के मुताबिक पोषण देना होना चाहिए, न कि खेत में अधिक से अधिक यूरिया डालना।
रिकॉर्ड पैदावार के लिए सिर्फ खाद पर निर्भर न रहें
धान की पैदावार केवल एक खाद से तय नहीं होती। पौधों की संख्या, किस्म, रोपाई की गहराई, पानी का प्रबंधन, खरपतवार नियंत्रण, पोषक तत्वों का संतुलन और रोग-कीट प्रबंधन सभी मिलकर उत्पादन को प्रभावित करते हैं।
इसलिए 50 दिन बाद दी जाने वाली खाद को फसल प्रबंधन की एक महत्वपूर्ण कड़ी समझना चाहिए। अगर खेत में पहले से पोषण संतुलित है, तो अतिरिक्त खाद डालना हमेशा अतिरिक्त उत्पादन में नहीं बदलता। दूसरी तरफ, यदि फसल में वास्तविक नाइट्रोजन की कमी है और सही समय पर अनुशंसित मात्रा दी जाती है, तो पौधों की वृद्धि और आगे की फसल अवस्था को बेहतर समर्थन मिल सकता है।
निष्कर्ष
धान में 50 दिन के आसपास खाद देना कई परिस्थितियों में महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन इसे किसी एक जादुई खाद का नियम मानना सही नहीं है। सही तरीका यह है कि किसान फसल की उम्र के साथ उसकी अवस्था, पत्तियों का रंग, मिट्टी की स्थिति और पहले दी गई खाद को देखकर फैसला करे।
नाइट्रोजन की अंतिम किस्त कई अनुशंसाओं में लगभग 50 से 60 दिन के आसपास आती है, लेकिन इसकी मात्रा हर खेत में समान नहीं हो सकती। इसलिए रिकॉर्ड पैदावार का रास्ता अधिक खाद डालने से नहीं, बल्कि फसल को सही समय पर सही पोषण देने से बनता है। 50 दिन की अवस्था को इसी नजरिए से देखें तो धान की आगे की बढ़वार और उत्पादन क्षमता को बेहतर तरीके से संभाला जा सकता है।


