धान की फसल में खरपतवार किसानों के लिए बड़ी परेशानी बन जाते हैं। खेत में घास, मोथा और चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार तेजी से बढ़ें तो वे धान के साथ पानी, पोषक तत्व, जगह और रोशनी के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। ऐसे में कई किसान ऐसी दवा की तलाश करते हैं जो कुछ ही घंटों में खेत के सभी खरपतवार को पूरी तरह खत्म कर दे।
लेकिन यहां एक जरूरी बात समझना जरूरी है। धान में खरपतवार नियंत्रण के लिए प्रभावी शाकनाशी उपलब्ध हैं, लेकिन किसी भी सामान्य दवा से सभी खरपतवारों का कुछ घंटे में 100 प्रतिशत खत्म हो जाना वैज्ञानिक रूप से सही दावा नहीं है। दवा का असर खरपतवार की प्रजाति, उसकी अवस्था, धान की अवस्था, मौसम और इस्तेमाल की गई दवा पर निर्भर करता है।
धान में खरपतवार की समस्या को समझना जरूरी
धान के खेत में एक ही प्रकार की घास नहीं होती। अलग-अलग खेतों में घास वर्ग के खरपतवार, मोथा वर्ग के खरपतवार और चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार एक साथ दिखाई दे सकते हैं। यही वजह है कि हर खेत में एक ही शाकनाशी समान परिणाम नहीं देता।
खरपतवार शुरुआती अवस्था में ही धान की फसल से पोषक तत्व और पानी लेना शुरू कर देते हैं। यदि समय पर नियंत्रण नहीं किया गया तो धान की बढ़वार प्रभावित हो सकती है। वैज्ञानिक कृषि सलाह में भी धान में खरपतवार नियंत्रण को फसल प्रबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है।
इसलिए खेत में खरपतवार दिखाई देने पर केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि घास कितनी है। यह पहचानना भी जरूरी है कि खेत में कौन-कौन से खरपतवार मौजूद हैं और धान की फसल इस समय किस अवस्था में है।
क्या कुछ घंटे में सभी खरपतवार 100 प्रतिशत खत्म हो जाते हैं?
नहीं, इस दावे को सही नहीं माना जाना चाहिए। खरपतवारनाशी दवा का खेत में छिड़काव करने के बाद कुछ समय में उसका प्रभाव शुरू हो सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी खरपतवार उसी समय दिखाई देना बंद कर देंगे।
कई शाकनाशी खरपतवार की वृद्धि को रोकते हैं और इसके बाद धीरे-धीरे उसके पौधे कमजोर पड़ते हैं। बाहर से देखने पर कुछ समय तक खरपतवार हरा दिखाई दे सकता है, जबकि उसके अंदर दवा का प्रभाव शुरू हो चुका होता है। इसलिए कुछ घंटे में खेत को पूरी तरह साफ दिखाई देने की उम्मीद करना उचित नहीं है।
धान में इस्तेमाल होने वाले अलग-अलग शाकनाशी अलग-अलग खरपतवारों पर काम करते हैं। उदाहरण के तौर पर, वैज्ञानिक कृषि सलाह में बिसपाइरिबैक सोडियम को मिश्रित खरपतवार वनस्पति के नियंत्रण के लिए धान में उपयोगी बताया गया है, जबकि अन्य परिस्थितियों में अलग शाकनाशियों की सलाह दी जाती है।
धान की फसल भी खराब हो सकती है क्या?
हां, गलत शाकनाशी, गलत मात्रा या गलत समय पर छिड़काव करने से धान की फसल को नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है। इसलिए खरपतवार जल्दी खत्म करने के चक्कर में दवा की मात्रा बढ़ाना सुरक्षित तरीका नहीं है।
धान की किस्म, फसल की उम्र और खेत की स्थिति के अनुसार शाकनाशी का चयन और उपयोग किया जाता है। कुछ शाकनाशी विशेष खरपतवारों के लिए बेहतर होते हैं, जबकि मिश्रित खरपतवार होने पर अलग विकल्प की जरूरत पड़ सकती है।
खरपतवारनाशी का असर केवल इस बात पर निर्भर नहीं करता कि दवा कितनी तेज है। छिड़काव का सही समय, पानी की स्थिति, खरपतवार की अवस्था और सही मात्रा भी बहुत महत्वपूर्ण होती है। कृषि अनुसंधान में शाकनाशी की प्रभावशीलता पर मौसम और पर्यावरणीय परिस्थितियों के प्रभाव को भी महत्वपूर्ण माना गया है।
खेत में सभी घास खत्म करने के लिए क्या ध्यान रखें?
धान में खरपतवार नियंत्रण के लिए सबसे पहले खेत में मौजूद खरपतवारों की पहचान करना जरूरी है। केवल खरपतवार देखकर किसी भी तेज दवा का इस्तेमाल करना सही तरीका नहीं है।
कृषि सलाह में अलग-अलग अवस्थाओं के लिए अलग शाकनाशियों की सिफारिश मिलती है। कुछ दवाएं रोपाई के कुछ दिनों बाद शुरुआती खरपतवार नियंत्रण के लिए इस्तेमाल होती हैं, जबकि कुछ का उपयोग बाद की अवस्था में किया जाता है। मिश्रित खरपतवार होने पर भी विकल्प अलग हो सकते हैं।
व्यावहारिक रूप से किसान को इन बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए:
- खेत में मौजूद खरपतवार की सही पहचान करें।
- धान की वर्तमान अवस्था के अनुसार ही शाकनाशी का चुनाव करें।
- दवा की मात्रा लेबल और कृषि विशेषज्ञ की अनुशंसा के अनुसार रखें।
- एक दवा से सभी प्रकार के खरपतवार खत्म होने की गारंटी मानकर अतिरिक्त मात्रा का छिड़काव न करें।
खरपतवार नियंत्रण में सही समय क्यों महत्वपूर्ण है?
धान में खरपतवार नियंत्रण का समय बहुत मायने रखता है। खरपतवार बहुत बड़े हो जाने के बाद उन्हें नियंत्रित करना कठिन हो सकता है। इसी कारण कृषि सलाह में धान की फसल की अवस्था और खरपतवार की अवस्था दोनों को ध्यान में रखकर शाकनाशी के उपयोग का समय बताया जाता है।
कुछ वैज्ञानिक सलाह में बिसपाइरिबैक सोडियम का उपयोग धान में मिश्रित खरपतवार वनस्पति के नियंत्रण के लिए लगभग 15 से 25 दिन बाद की अवस्था में बताया गया है। दूसरी ओर, कुछ शुरुआती खरपतवार नियंत्रण के लिए रोपाई के कुछ दिनों बाद इस्तेमाल किए जाने वाले विकल्प भी बताए गए हैं। इसका मतलब यह है कि एक ही दवा हर समय और हर खेत के लिए सही नहीं हो सकती।
इसके अलावा, केवल रासायनिक नियंत्रण पर निर्भर रहने के बजाय समन्वित खरपतवार प्रबंधन पर भी जोर दिया जा रहा है। इसमें फसल की स्थिति, खेत प्रबंधन और आवश्यकता के अनुसार अलग-अलग नियंत्रण उपायों का इस्तेमाल शामिल होता है।
किसान 100 प्रतिशत खरपतवार खत्म करने के दावे से सावधान रहें
धान के खेत में खरपतवार पूरी तरह नियंत्रित करना संभव लक्ष्य हो सकता है, लेकिन किसी सामान्य शाकनाशी के बारे में यह कहना कि वह कुछ घंटे में खेत के सभी खरपतवार को 100 प्रतिशत खत्म कर देगा, वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है।
खरपतवार नियंत्रण का परिणाम खेत में मौजूद प्रजातियों और उनकी अवस्था के अनुसार बदल सकता है। कुछ खरपतवार किसी दवा के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकते हैं, जबकि दूसरे खरपतवारों के लिए अलग शाकनाशी या अलग प्रबंधन की आवश्यकता हो सकती है। यही कारण है कि हाल के कृषि अनुसंधान में शाकनाशी प्रतिरोध और बदलती परिस्थितियों में शाकनाशी की प्रभावशीलता जैसे विषयों पर भी लगातार काम किया जा रहा है।
निष्कर्ष
धान के खेत में खरपतवार को जल्दी नियंत्रित करना जरूरी है, लेकिन कुछ घंटे में सभी खरपतवार 100 प्रतिशत खत्म करने वाले दावे पर आंख बंद करके भरोसा करना ठीक नहीं है। सही दवा का चुनाव खरपतवार की पहचान, धान की अवस्था और खेत की परिस्थितियों के आधार पर होना चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि खरपतवार जल्दी खत्म करने के लिए शाकनाशी की मात्रा अपनी तरफ से बढ़ाकर न डालें। गलत दवा या गलत मात्रा से जहां खरपतवार नियंत्रण असफल हो सकता है, वहीं धान की फसल को भी नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है। इसलिए खेत में मौजूद खरपतवार के प्रकार की पहचान करके उसी के अनुसार अनुशंसित शाकनाशी और सही उपयोग विधि अपनाना ही सुरक्षित और प्रभावी तरीका है।


