सोयाबीन दुसरी फवारणी | Soyabean dusri favarni | Soyabean second spray

सोयाबीन दुसरी फवारणी | Soyabean dusri favarni | Soyabean second spray

सोयाबीन की फसल में दूसरी फवारणी का समय आते ही किसानों के सामने सबसे बड़ा सवाल रहता है कि इस बार किस समस्या को देखकर छिड़काव किया जाए। दूसरी फवारणी केवल दिन गिनकर करने के बजाय फसल की अवस्था, कीटों की संख्या और रोग के लक्षण देखकर तय करना ज्यादा जरूरी है।

इस समय सोयाबीन में पत्तियां खाने वाली इल्लियां, तना मक्खी, गर्डल बीटल तथा फूल और फलियों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों की निगरानी महत्वपूर्ण हो जाती है। इसलिए दूसरी फवारणी को खेत की वास्तविक स्थिति के अनुसार तय करना चाहिए।

सोयाबीन में दूसरी फवारणी कब करनी चाहिए

सोयाबीन में दूसरी फवारणी के लिए कोई एक तारीख या सभी खेतों पर लागू होने वाला निश्चित दिन नहीं है। फसल की बुवाई का समय, किस्म, मौसम और खेत में मौजूद कीट या रोग के आधार पर छिड़काव का समय बदल सकता है। खासकर फूल आने के आसपास फसल की नियमित निगरानी करना जरूरी होता है, क्योंकि इस अवस्था में पत्ती खाने वाली इल्लियां फूलों को भी नुकसान पहुंचा सकती हैं।

इसलिए यदि पहली फवारणी के बाद भी खेत में कीटों का प्रकोप बना हुआ है या नया प्रकोप दिखाई दे रहा है, तो दूसरी फवारणी की जरूरत हो सकती है। वहीं यदि खेत में कीट या रोग का आर्थिक नुकसान स्तर तक प्रकोप नहीं है, तो केवल परंपरा के अनुसार दूसरा छिड़काव कर देना जरूरी नहीं है।

फसल की अवस्था को देखकर निर्णय लेना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि एक ही दवा को बार-बार इस्तेमाल करने से कीटों में उस रसायन के प्रति सहनशीलता विकसित होने का खतरा बढ़ सकता है। दूसरी फवारणी में पहले इस्तेमाल किए गए रसायन की जगह अलग प्रभाव वाले स्वीकृत कीटनाशक का चुनाव स्थानीय कृषि सलाह के अनुसार किया जाना चाहिए।

दूसरी फवारणी से पहले खेत में क्या देखें

दूसरी फवारणी करने से पहले किसान को पूरे खेत का निरीक्षण करना चाहिए। केवल खेत के किनारे या एक-दो पौधों पर कीट दिखाई देने से पूरे खेत में तुरंत छिड़काव करने का फैसला नहीं करना चाहिए। अलग-अलग स्थानों से पौधों की जांच करने पर वास्तविक स्थिति का बेहतर अंदाजा मिलता है।

इन बातों पर विशेष ध्यान दें:

  • पत्तियों पर छोटी या बड़ी इल्लियां दिखाई दे रही हैं या नहीं।
  • नई पत्तियों, फूलों या कोमल हिस्सों पर कीटों से हुआ नुकसान बढ़ रहा है या नहीं।
  • तने पर सुरंग, छेद या कमजोर पौधों जैसे लक्षण दिखाई दे रहे हैं या नहीं।
  • पत्तियों पर धब्बे, पीला पड़ना या अन्य रोग के स्पष्ट लक्षण दिखाई दे रहे हैं या नहीं।

सोयाबीन में पत्ती खाने वाली इल्लियों और दूसरे प्रमुख कीटों की स्थिति के अनुसार ही नियंत्रण उपाय तय करने की सलाह दी जाती है। फूल आने की अवस्था में फसल की निगरानी और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि कुछ इल्लियां फूलों को नुकसान पहुंचाकर फलियों के बनने पर असर डाल सकती हैं।

दूसरी फवारणी में कौन सी दवा लें

सोयाबीन की दूसरी फवारणी के लिए किसी एक दवा को हर खेत में समान रूप से इस्तेमाल करना सही तरीका नहीं है। दवा का चुनाव इस बात पर निर्भर करता है कि खेत में कौन सा कीट या रोग मौजूद है। कीट की पहचान किए बिना कई दवाओं को मिलाकर छिड़काव करना भी उचित नहीं है।

सोयाबीन में पत्ती खाने वाली इल्लियों और फूलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों के नियंत्रण के लिए विभिन्न स्वीकृत कीटनाशकों की सिफारिशें की गई हैं। इनमें क्लोरेंट्रानिलिप्रोल, इंडोक्साकार्ब, फ्लूबेंडियामाइड, स्पिनेटोरम और कुछ अन्य प्रभावी कीटनाशक शामिल रहे हैं, लेकिन इनका चयन और मात्रा लक्षित कीट, उत्पाद के लेबल और स्थानीय कृषि सलाह के अनुसार ही किया जाना चाहिए।

यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि कीटनाशक की मात्रा फसल में मनमाने तरीके से बढ़ाना सुरक्षित या प्रभावी तरीका नहीं है। जिस उत्पाद का इस्तेमाल किया जा रहा है, उसके लेबल पर सोयाबीन फसल और संबंधित कीट के लिए दी गई स्वीकृत मात्रा का ही पालन करना चाहिए।

यदि खेत में बीमारी के लक्षण दिखाई दे रहे हैं, तो केवल कीटनाशक डालने से समस्या का समाधान नहीं होगा। रोग का सही कारण पहचानकर उसी के अनुसार फफूंदनाशी या अन्य अनुशंसित उपाय का इस्तेमाल करना जरूरी है।

फसल की अवस्था के अनुसार रखें विशेष सावधानी

सोयाबीन की फसल में फूल आने के आसपास का समय विशेष ध्यान देने वाला होता है। इस समय खेत में नियमित निगरानी नहीं होने पर पत्तियों और फूलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीट तेजी से बढ़ सकते हैं। वैज्ञानिक सलाह में भी फूल अवस्था में फसल की नियमित निगरानी पर जोर दिया गया है।

दूसरी ओर, बारिश के बाद खेत में लगातार नमी रहने पर रोगों की समस्या भी बढ़ सकती है। इसलिए फसल में पानी रुकने की स्थिति नहीं बनने देनी चाहिए और खेत की स्थिति के अनुसार प्रबंधन करना चाहिए। सोयाबीन के लिए अच्छी जल निकासी और संतुलित फसल प्रबंधन को महत्वपूर्ण माना गया है।

फवारणी के समय मौसम भी देखना चाहिए। तेज हवा, बारिश की संभावना या बहुत गर्म परिस्थितियों में छिड़काव करने से दवा का प्रभाव प्रभावित हो सकता है। साफ और अपेक्षाकृत शांत मौसम में लेबल के निर्देशों के अनुसार छिड़काव करना बेहतर रहता है।

दूसरी फवारणी में किसान इन गलतियों से बचें

दूसरी फवारणी के नाम पर एक साथ कई कीटनाशक, फफूंदनाशी, खरपतवारनाशी और पोषक तत्व मिलाकर टैंक मिक्स तैयार करना हर स्थिति में सही नहीं होता। अलग-अलग उत्पादों की आपसी संगतता अलग हो सकती है। किसी मिश्रण का इस्तेमाल तभी करना चाहिए जब उसकी संगतता और उपयोग की सिफारिश स्पष्ट हो।

पहली फवारणी में जिस रसायन का इस्तेमाल किया गया था, उसे बिना कारण दोबारा इस्तेमाल करने से भी बचना चाहिए। कीट नियंत्रण में अलग प्रभाव वाले रसायनों का उचित रोटेशन प्रतिरोध की समस्या को कम करने में मदद कर सकता है।

फवारणी करते समय सुरक्षा को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। दस्ताने, मास्क और उपयुक्त सुरक्षात्मक कपड़े पहनना चाहिए तथा दवा की पैकिंग पर दिए गए सावधानी संबंधी निर्देशों का पालन करना चाहिए।

सोयाबीन की दूसरी फवारणी को लेकर सबसे जरूरी बात

सोयाबीन की दूसरी फवारणी का सही तरीका यह है कि किसान पहले खेत की स्थिति देखे और उसके बाद निर्णय ले। केवल यह मान लेना कि पहली फवारणी के कुछ दिन बाद दूसरी फवारणी हर हालत में करनी ही है, वैज्ञानिक दृष्टि से सही नहीं है।

यदि खेत में पत्ती खाने वाली इल्लियां, फूलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीट या अन्य प्रमुख कीट दिखाई दे रहे हैं, तो उनकी पहचान के आधार पर स्वीकृत कीटनाशक का इस्तेमाल किया जा सकता है। वहीं रोग के लक्षण होने पर रोग के अनुसार अलग प्रबंधन की जरूरत होगी।

किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दूसरी फवारणी को कैलेंडर के बजाय फसल की वास्तविक स्थिति से जोड़ें। खेत की नियमित निगरानी, सही कीट की पहचान, उचित दवा का चयन, सही मात्रा और मौसम को ध्यान में रखकर किया गया छिड़काव ही सोयाबीन की फसल को अनावश्यक नुकसान और अतिरिक्त खर्च से बचाने में मदद कर सकता है।

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