जिंक सल्फ़ेट काे कब, कितना और कैसे डालें

जिंक सल्फ़ेट काे कब, कितना और कैसे डालें

जिंक सल्फ़ेट फसलों के लिए जरूरी सूक्ष्म पोषक तत्व जिंक की कमी को पूरा करने वाली प्रमुख खाद है। खासकर धान जैसी फसलों में जिंक की कमी होने पर पौधों की बढ़वार और कल्ले निकलने पर असर पड़ सकता है। ऐसे में सही समय, सही मात्रा और सही तरीके से जिंक सल्फ़ेट डालना जरूरी है।

लेकिन जिंक सल्फ़ेट हर खेत में एक जैसी मात्रा में डालना सही नहीं है। इसकी जरूरत फसल, मिट्टी की स्थिति और जिंक की कमी की गंभीरता के आधार पर तय की जाती है। इसलिए किसान को केवल मात्रा ही नहीं, बल्कि इसके इस्तेमाल का तरीका भी समझना चाहिए।

जिंक सल्फ़ेट क्या है और फसल के लिए क्यों जरूरी है

जिंक सल्फ़ेट जिंक उपलब्ध कराने वाली एक सामान्य और अपेक्षाकृत किफायती खाद है। कृषि में जिंक की कमी वाली मिट्टी को सुधारने के लिए जिंक सल्फ़ेट का इस्तेमाल किया जाता है। बाजार में मुख्य रूप से जिंक सल्फ़ेट हेप्टाहाइड्रेट में करीब 21 प्रतिशत जिंक और मोनोहाइड्रेट में करीब 33 प्रतिशत जिंक वाले उत्पाद मिलते हैं।

जिंक पौधे में कई महत्वपूर्ण जैविक प्रक्रियाओं में भूमिका निभाता है। इसकी कमी होने पर पौधों की सामान्य बढ़वार प्रभावित हो सकती है और पत्तियों पर कमी के लक्षण दिखाई दे सकते हैं। धान में जिंक की कमी के कारण पौधों की बढ़वार रुकना, पत्तियों पर असामान्य रंग या धब्बे आना और कल्ले कम निकलना जैसे लक्षण देखे जा सकते हैं।

इसलिए जिंक सल्फ़ेट को केवल सामान्य खाद समझकर जरूरत से ज्यादा डालना उचित नहीं है। इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से तब ज्यादा उपयोगी होता है जब मिट्टी या फसल में जिंक की कमी हो।

जिंक सल्फ़ेट कब डालना चाहिए

जिंक सल्फ़ेट डालने का सबसे अच्छा समय फसल और इस्तेमाल के तरीके पर निर्भर करता है। मिट्टी में देने की स्थिति में इसे सामान्यतः फसल की शुरुआती अवस्था में या बुवाई अथवा रोपाई के समय बेसल पोषक तत्व के रूप में दिया जाता है। कई फसलों में जिंक की कमी वाली मिट्टी के लिए 25 किलोग्राम जिंक सल्फ़ेट प्रति हेक्टेयर की सिफारिश मिलती है, लेकिन यह मात्रा सभी फसलों के लिए सार्वभौमिक नियम नहीं है।

धान में जिंक की कमी वाली मिट्टी में जिंक सल्फ़ेट को खेत में मिट्टी के माध्यम से देना एक सामान्य तरीका है। कुछ परिस्थितियों में फसल की बढ़वार के दौरान पत्तियों पर जिंक सल्फ़ेट का छिड़काव भी किया जा सकता है।

अगर फसल में जिंक की कमी के लक्षण पहले से दिखाई दे रहे हैं, तो केवल अगली फसल तक इंतजार करना जरूरी नहीं होता। ऐसी स्थिति में फसल के लिए स्वीकृत और अनुशंसित पत्तियों पर छिड़काव का विकल्प अपनाया जा सकता है।

कितना जिंक सल्फ़ेट डालें

जिंक सल्फ़ेट की मात्रा तय करते समय सबसे पहले यह देखना जरूरी है कि इस्तेमाल मिट्टी में करना है या पत्तियों पर छिड़काव के रूप में। दोनों की मात्रा और तरीका अलग होता है।

जिंक सल्फ़ेट 21 प्रतिशत और 33 प्रतिशत जिंक वाले अलग-अलग रूपों में मिलता है। इसलिए केवल खाद का वजन देखकर तुलना करना सही नहीं है। अधिक प्रतिशत वाले उत्पाद में जिंक की मात्रा अधिक होती है और उसकी जरूरत उसी हिसाब से तय की जाती है।

जिंक की कमी वाली मिट्टी के लिए कई फसलों में 25 किलोग्राम जिंक सल्फ़ेट प्रति हेक्टेयर का प्रयोग बताया गया है। उदाहरण के तौर पर धान की कुछ उत्पादन प्रणालियों में जिंक की कमी होने पर 25 किलोग्राम जिंक सल्फ़ेट प्रति हेक्टेयर मिट्टी में देने की सिफारिश की गई है। एक हेक्टेयर लगभग 2.47 एकड़ होता है, इसलिए किसी स्थानीय फसल सिफारिश को एकड़ में बदलते समय सही गणना करना जरूरी है।

पत्तियों पर छिड़काव के लिए मात्रा बहुत कम होती है। धान में जरूरत के अनुसार 0.5 प्रतिशत जिंक सल्फ़ेट घोल का छिड़काव करने की कृषि सिफारिशें उपलब्ध हैं। 0.5 प्रतिशत घोल का सामान्य अर्थ 1 लीटर पानी में 5 ग्राम जिंक सल्फ़ेट है। हालांकि उत्पाद के प्रकार और फसल की अनुशंसित मात्रा को देखते हुए लेबल निर्देशों का पालन करना चाहिए।

खेत में जिंक सल्फ़ेट डालने का सही तरीका

मिट्टी में जिंक सल्फ़ेट डालते समय उसका खेत में समान रूप से फैलना जरूरी है। किसी एक जगह अधिक मात्रा में डालने के बजाय पूरे क्षेत्र में समान वितरण करने से पोषक तत्व के उपयोग की संभावना बेहतर रहती है।

कुछ कृषि सिफारिशों में जिंक सल्फ़ेट को समान मात्रा में रेत के साथ मिलाकर खेत में समान रूप से फैलाने की विधि बताई गई है। इससे कम मात्रा वाले सूक्ष्म पोषक तत्व को पूरे खेत में एकसमान फैलाने में मदद मिल सकती है।

धान जैसी फसल में जिंक सल्फ़ेट की मिट्टी में दी जाने वाली मात्रा फसल की पोषण प्रबंधन योजना के साथ रखनी चाहिए। केवल जिंक डालने से बाकी पोषक तत्वों की जरूरत खत्म नहीं होती। नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और अन्य पोषक तत्वों का संतुलित प्रबंधन भी जरूरी है।

जिंक सल्फ़ेट को आंख बंद करके हर साल एक ही मात्रा में डालना भी उचित नहीं है। खेत की मिट्टी में जिंक की स्थिति और पिछले वर्षों में किए गए प्रयोग को ध्यान में रखना बेहतर रहता है।

पत्तियों पर जिंक सल्फ़ेट का छिड़काव कैसे करें

जब फसल में जिंक की कमी दिखाई दे या मिट्टी के माध्यम से तुरंत सुधार करना मुश्किल हो, तब पत्तियों पर छिड़काव उपयोगी विकल्प हो सकता है। धान के लिए 0.5 प्रतिशत जिंक सल्फ़ेट का पत्तियों पर छिड़काव कृषि सिफारिशों में शामिल है।

घोल तैयार करते समय जिंक सल्फ़ेट को पानी में अच्छी तरह घोलना चाहिए और पूरे पौधे पर समान रूप से छिड़काव करना चाहिए। छिड़काव के लिए साफ पानी और अच्छी तरह काम करने वाले स्प्रेयर का इस्तेमाल करना बेहतर रहता है।

पत्तियों पर छिड़काव करते समय तेज धूप और बहुत गर्म परिस्थितियों से बचना चाहिए। बारिश की संभावना होने पर भी छिड़काव करने से बचना चाहिए, क्योंकि बारिश होने पर घोल पत्तियों से धुल सकता है।

जिंक सल्फ़ेट को किसी दूसरी खाद या कृषि रसायन के साथ टैंक में मिलाने से पहले उनकी आपसी संगतता और उत्पाद के निर्देशों की जांच करना जरूरी है। बिना जानकारी के कई उत्पादों को एक साथ मिलाने से फसल को नुकसान हो सकता है।

जिंक की कमी के लक्षणों को कैसे पहचानें

जिंक की कमी के लक्षण फसल के अनुसार अलग-अलग दिखाई दे सकते हैं। केवल पत्तियों का रंग बदलने को जिंक की कमी मान लेना सही नहीं है, क्योंकि कई दूसरे पोषक तत्वों की कमी और कुछ अन्य समस्याओं में भी पौधों में मिलते-जुलते लक्षण दिखाई दे सकते हैं।

धान में जिंक की कमी होने पर पौधों की बढ़वार प्रभावित हो सकती है, कल्ले कम निकल सकते हैं और पत्तियों पर असामान्य रंग या धब्बे दिखाई दे सकते हैं। कमी की स्थिति और लक्षणों की तीव्रता खेत तथा फसल की परिस्थितियों के अनुसार अलग हो सकती है।

इसलिए संभव हो तो मिट्टी की जांच के आधार पर जिंक की जरूरत तय करना अधिक भरोसेमंद तरीका है। केवल लक्षण देखकर लगातार जिंक डालते रहना उचित नहीं है।

जिंक सल्फ़ेट डालते समय इन बातों का रखें ध्यान

जिंक सल्फ़ेट का इस्तेमाल करते समय मात्रा से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि वह सही फसल, सही समय और सही तरीके से दिया जाए। जरूरत से ज्यादा जिंक डालने से हमेशा फायदा बढ़ेगा, ऐसा नहीं है।

  • पहले यह पता करें कि खेत में वास्तव में जिंक की कमी है या नहीं और फसल के लिए कितनी मात्रा की जरूरत है।
  • 21 प्रतिशत और 33 प्रतिशत जिंक वाले जिंक सल्फ़ेट को एक ही मात्रा मानकर इस्तेमाल न करें।
  • मिट्टी में देने और पत्तियों पर छिड़काव की मात्रा को आपस में बदलकर इस्तेमाल न करें।
  • जिंक सल्फ़ेट को दूसरी खाद या दवा के साथ मिलाने से पहले उसकी संगतता और उपयोग संबंधी निर्देश जरूर देखें।

किसान के लिए सबसे जरूरी बात

जिंक सल्फ़ेट का इस्तेमाल फसल की जरूरत के हिसाब से करना चाहिए। जिंक की कमी वाली मिट्टी में मिट्टी के माध्यम से जिंक सल्फ़ेट देना लंबे समय के पोषण प्रबंधन का हिस्सा हो सकता है, जबकि फसल में कमी के लक्षण दिखाई देने पर अनुशंसित पत्तीय छिड़काव एक अलग विकल्प है।

विशेष रूप से धान में जिंक की कमी वाली मिट्टी के लिए 25 किलोग्राम जिंक सल्फ़ेट प्रति हेक्टेयर जैसी सिफारिशें मिलती हैं, जबकि पत्तियों पर जरूरत के अनुसार 0.5 प्रतिशत घोल का इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन किसान को अपनी फसल, मिट्टी और इस्तेमाल किए जा रहे जिंक सल्फ़ेट के प्रकार के अनुसार अंतिम मात्रा तय करनी चाहिए।

सही तरीके से इस्तेमाल किया गया जिंक सल्फ़ेट फसल में जिंक की कमी को पूरा करने में मदद कर सकता है। वहीं बिना जरूरत या गलत मात्रा में इस्तेमाल करने से खाद की लागत बढ़ सकती है और संतुलित पोषण व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। इसलिए मिट्टी की जांच, फसल की स्थिति और स्थानीय कृषि सिफारिश को आधार बनाकर जिंक सल्फ़ेट का प्रयोग करना सबसे सुरक्षित और व्यावहारिक तरीका है।

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