धान की फसल में सुंडी, पत्ती लपेटक और तना छेदक जैसे कीट समय पर नियंत्रण न होने पर पौधों की बढ़वार और बालियों के विकास को प्रभावित कर सकते हैं। खासकर तना छेदक की सुंडी तने के अंदर पहुंचकर नुकसान करती है, जबकि पत्ती लपेटक की सुंडी पत्तियों को मोड़कर या लपेटकर उनके हरे हिस्से को खाती है। ऐसे में किसान के लिए सबसे जरूरी बात है कि पहले कीट की सही पहचान की जाए और उसके बाद ही उचित कीटनाशक का इस्तेमाल किया जाए।
धान में तना छेदक की पहचान कैसे करें
तना छेदक धान का प्रमुख कीट है। इसकी सुंडी पौधे के तने के अंदर जाकर ऊतक को नुकसान पहुंचाती है। फसल की शुरुआती या वानस्पतिक अवस्था में इसका प्रमुख लक्षण बीच की कोंपल का सूख जाना है, जिसे डेड हार्ट कहा जाता है। सूखी कोंपल को खींचने पर वह आसानी से बाहर आ सकती है।
जब फसल बालियां बनने की अवस्था में पहुंचती है और तना छेदक का प्रकोप होता है, तब प्रभावित बालियां सफेद दिखाई दे सकती हैं और उनमें दाने नहीं बनते। इसे सामान्य तौर पर सफेद बाली या व्हाइट ईयरहेड का लक्षण कहा जाता है। इसलिए खेत में सूखी बीच की कोंपल या असामान्य रूप से सफेद बालियां दिखाई दें तो तना छेदक की मौजूदगी की जांच करना जरूरी है।
पत्ती लपेटक या सुंडी का प्रकोप कैसे पहचानें
धान में पत्ती लपेटक की सुंडी पत्ती को किनारों से लपेटकर या मोड़कर उसके अंदर रहती है। वह पत्ती के हरे भाग को खाती है, जिससे पत्तियों पर सफेद या पारदर्शी धारियां दिखाई देने लगती हैं। अधिक प्रकोप होने पर पत्तियों का हरा क्षेत्र काफी कम हो सकता है और पौधे की प्रकाश संश्लेषण क्षमता प्रभावित होती है।
पत्ती को ध्यान से खोलने पर अंदर सुंडी या उसके द्वारा बनाया गया जाल दिखाई दे सकता है। यही कारण है कि केवल ऊपर से खेत देखने के बजाय कुछ प्रभावित पत्तियों को खोलकर जांच करना उपयोगी रहता है।
तना छेदक और पत्ती लपेटक के लिए कौन सी दवा काम करती है
तना छेदक और पत्ती लपेटक दोनों सुंडी वर्ग के कीटों से जुड़े हैं, इसलिए कुछ कीटनाशक दोनों पर प्रभावी पाए गए हैं। उपलब्ध कृषि अनुसंधान में क्लोरेंट्रानिलिप्रोल 18.5 प्रतिशत एससी को धान के तना छेदक और पत्ती लपेटक के नियंत्रण के लिए प्रभावी विकल्पों में शामिल किया गया है। अलग-अलग परीक्षणों में इस सक्रिय घटक से दोनों कीटों के प्रकोप में कमी दर्ज की गई है।
कृषि अनुसंधान में क्लोरेंट्रानिलिप्रोल 18.5 प्रतिशत एससी के लिए 30 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर की दर का उपयोग तना छेदक और पत्ती लपेटक के विरुद्ध किया गया है। कुछ कृषि विभागीय सिफारिशों में इसी फॉर्मूलेशन के लिए 3 मिलीलीटर प्रति 10 लीटर पानी जैसी खेत-स्तरीय मात्रा भी दी गई है। हालांकि किसान को अपने क्षेत्र में वर्तमान पंजीकृत उपयोग, फसल की अवस्था और उत्पाद के लेबल पर दी गई मात्रा को प्राथमिकता देनी चाहिए।
क्लोरेंट्रानिलिप्रोल के अलावा थायोसाइक्लाम हाइड्रोजन ऑक्सालेट जैसे सक्रिय घटक पर भी हाल के शोध में तना छेदक और पत्ती लपेटक के खिलाफ प्रभाव देखा गया है। इसलिए किसी एक दवा को हर खेत में बिना कीट की स्थिति देखे बार-बार इस्तेमाल करना उचित तरीका नहीं है।
दवा का छिड़काव करते समय इन बातों का रखें ध्यान
कीटनाशक का असर केवल दवा के नाम पर निर्भर नहीं करता। सही समय पर सही कीट की पहचान, उचित मात्रा और खेत में पर्याप्त कवरेज भी महत्वपूर्ण है। तना छेदक की सुंडी तने के अंदर पहुंच जाने के बाद उस पर सीधे संपर्क वाली दवा का असर सीमित हो सकता है, इसलिए प्रकोप की शुरुआती स्थिति में निगरानी और समय पर नियंत्रण अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।
पत्ती लपेटक के मामले में प्रभावित पत्तियों को खोलकर सुंडी की मौजूदगी देखना चाहिए। खेत में कीट की वास्तविक स्थिति जाने बिना केवल पत्तियों के पीले या सूखे होने को देखकर कीटनाशक का छिड़काव नहीं करना चाहिए, क्योंकि धान में पोषक तत्वों की कमी, पानी की समस्या और अन्य कारणों से भी पत्तियां प्रभावित हो सकती हैं।
कीटनाशक का प्रयोग करते समय किसान को मुख्य रूप से इन बातों का ध्यान रखना चाहिए:
- खेत में कीट की सही पहचान और प्रकोप की स्थिति देखकर ही छिड़काव करें।
- उत्पाद के लेबल पर धान और संबंधित कीट के लिए दी गई मात्रा का पालन करें।
- एक ही सक्रिय घटक का बार-बार इस्तेमाल करने से बचें और जरूरत पड़ने पर कीटनाशक समूहों में बदलाव करें।
- छिड़काव के समय सुरक्षा उपकरणों का इस्तेमाल करें और लेबल पर दिए गए सुरक्षा निर्देशों का पालन करें।
खेत में निगरानी भी है जरूरी
धान में तना छेदक और पत्ती लपेटक का नियंत्रण केवल कीटनाशक पर निर्भर नहीं होना चाहिए। खेत की नियमित निगरानी करने से शुरुआती प्रकोप का पता लगाया जा सकता है। तना छेदक की निगरानी के लिए फेरोमोन ट्रैप का इस्तेमाल भी किया जाता है, जिससे वयस्क कीट की गतिविधि का अंदाजा लगाने में मदद मिल सकती है।
अत्यधिक नाइट्रोजन वाली खाद का असंतुलित इस्तेमाल भी खेत में कीट प्रबंधन को मुश्किल बना सकता है। इसलिए पोषक तत्वों का संतुलित इस्तेमाल, खेत की नियमित निगरानी और जरूरत के अनुसार कीट नियंत्रण उपाय अपनाना बेहतर रणनीति है।
यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि खेत में हर सुंडी को देखकर तुरंत दवा का छिड़काव करना जरूरी नहीं होता। कीट की संख्या, फसल की अवस्था और नुकसान की मात्रा को देखकर निर्णय लेना चाहिए। इससे अनावश्यक कीटनाशक उपयोग कम करने में मदद मिलती है और लाभकारी कीटों पर पड़ने वाला असर भी कम किया जा सकता है।
किसान के लिए सबसे जरूरी बात
धान में सुंडी, पत्ती लपेटक और तना छेदक दिखाई देने पर सबसे पहले यह पता करना जरूरी है कि नुकसान किस कीट से हो रहा है। तना छेदक में डेड हार्ट और सफेद बालियां जैसे लक्षण महत्वपूर्ण संकेत हैं, जबकि पत्ती लपेटक में मुड़ी या लिपटी पत्तियों के अंदर सुंडी मिल सकती है।
तना छेदक और पत्ती लपेटक दोनों के लिए क्लोरेंट्रानिलिप्रोल 18.5 प्रतिशत एससी पर कृषि अनुसंधान में प्रभावी परिणाम मिले हैं, लेकिन इसकी मात्रा और इस्तेमाल का तरीका हमेशा वर्तमान लेबल और स्थानीय कृषि सलाह के अनुसार ही तय करना चाहिए। जरूरत से ज्यादा दवा डालना अधिक प्रभावी नियंत्रण की गारंटी नहीं देता।
इसलिए धान की फसल में सही तरीका यही है कि खेत की नियमित निगरानी की जाए, कीट की पहचान पक्की की जाए और प्रकोप की स्थिति में पंजीकृत कीटनाशक का निर्धारित मात्रा में इस्तेमाल किया जाए। समय पर पहचान और उचित नियंत्रण से तना छेदक तथा पत्ती लपेटक से होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।


